कोरोना या लॉकडाउन --- जीत किसकी ?
June 1, 2020 • rajendra k mishra

कोरोना संक्रमण के मामले में आज हम विश्व में सातवें स्थान पर आ गए हैं। इस मामले में हमने अब फ्रांस को पीछे छोड़ दिया है। 25 मई को हम ईरान को पछाड़कर 10 वे स्थान पर आ गए थे जब हमारे देश में कोरोना मामलों की संख्या 1.38 लाख थी। अब 1.90 लाख  के ऊपर है और हमसे आगे अब छह देश यानी इटली, इंग्लैंड, स्पेन, रूस, ब्राजील व अमेरिका है।
  हालांकि हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इस रविवार मन की बात में देशवासियों से कहा है कि बड़ी आबादी के बावजूद हम अन्य देशों की तरह कोरोना महामारी से बुरी तरह प्रभावित नहीं हुए हैं।  अब 1 जून से हम लॉक डाउन से अनलॉक होने की ओर जा रहे हैं जब हम लॉकडाउन में गए थे तब कोरोना मामलों की संख्या 500 थी और अब लॉक डाउन से बाहर निकलने के समय एक लाख 90 हजार के ऊपर है।  हालांकि यह भी निश्चित है कि जिन देशों ने लॉक डाउन को गंभीरता से नहीं लिया उनकी हालत गंभीर है। लेकिन कोरोना वायरस की गिरफ्त में आने के बाद सख्ती से लॉक डाउन लागू करने वाले इटली, स्पेन, जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों में महामारी अब या तो स्थिर या उतार की ओर अग्रसर है। लेकिन इसके विपरीत अपने देश में कोरोना के रोजाना बढ़ने वाले मामले चिंताजनक है। कोरोना महावारी वह लॉकडाउन काल में हम अपने आप को चिकित्सीय व आर्थिक रूप से कहां पाते हैं इस पर देश के चिंतकों की अलग-अलग राय है।

      पूर्व आईपीएस ऑफिसर व ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता एस आर दारापुरी, लखनऊ का मानना है कि लॉक डाउन सरकार की बिना सोचे समझे की गई कार्यवाही थी जिसका खामियाजा लोगों को विशेषकर प्रवासी श्रमिकों को उठाना पड़ा। वे कहते हैं कि सरकार देश की आर्थिक हालत के लिए जिम्मेदार है, और इससे निपटने के लिए जो 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज जिसको सरकार जीडीपी का 10% बता रही है वह मात्र 2% है, और लोन के रूप में है जिससे लोगों को राहत नहीं मिलेगी।
  वे कहते हैं हालांकि हमारे देश के स्वास्थ्य कर्मी कड़ी मेहनत कर रहे हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि चिकित्सीय संसाधनों वह आर्थिक मजबूरियों के कारण वह वह जून-जुलाई में आने वाले कोरोना सुनामी से निपटने में कामयाब हो पाएंगे। कोरोना से निपटने के सुझाव में वे कहते हैं कि देश के सभी प्राइवेट अस्पतालों को अंशकालिक राष्ट्रीयकरण करके प्रभावित लोगों के इलाज में लगाया जाना चाहिए। वहीं प्रत्येक देशवासी को विशेषकर प्रवासी श्रमिकों को 6 महीने तक ₹5000 प्रतिमाह पहुंचाया जाना चाहिए।
      आईआईटी मुंबई से पासआउट, स्वीडन के एक विश्वविद्यालय में प्रफेसर व सामाजिक कार्यकर्ता डॉ रविकांत पाठक का मानना है कि लॉकडाउन सरकार का शुरुआत में ही उठाया गया उचित कदम था, जिसके कारण हम आज और अधिक अनहोनी को न होने से रोक पाए हैं। वे कहते हैं कि हां लॉकडाउन में देश के आर्थिक हालात बिगड़े हैं क्योंकि सरकार के पास ऐसे हालात में निपटने के लिए कोई साफ़ विजन नहीं था। हालांकि हमारी स्वास्थ्य सेवाएं अच्छा काम कर रही है। लेकिन अगर कोरोना के मामले तेजी से बढ़े तो समस्या खड़ी हो सकती है।
  उनका मानना है कि कोरोना महामारी से बचने के लिए अभी केवल एक और एक उपाय है कि हम अपने प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाए, और इसके लिए सरकार आयुर्वेदिक नुक्से को अपनाने की सलाह को प्रचारित करें। साथ ही हमें कार्य पर वापस लौटना भी पड़ेगा, जरूरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को सुरक्षा मापदंडों के से अवगत कराया जाए जिससे लोग अपने आप को सुरक्षित रख सकें।
     युवा राजनैतिज्ञ व व्यवसाई सौरव तिवारी, रायपुर का कहना है कि लॉक डाउन सरकार की बिना तैयारी से की गई कार्रवाई थी जिससे देश के आर्थिक स्थिति बिगड़ी है। उनका मानना है कि जब पूरा देश लॉक डाउन में है तो कैसे माना जाए कि देश की आर्थिक स्थिति सुरक्षित रहेगी वे कहते हैं कि कोरोना महामारी के संकट से निपटने के लिए ज्यादा से ज्यादा जांच हो, और पहचान होने पर लोगों को आइसोलेट किया जाए, व आर्थिक गतिविधियां एवं व्यवसाय सामान्य रूप से खोला जाए।
      सॉफ्टवेयर व  आईटी  प्रोफेशनल अजय शर्मा, हैदराबाद कहते हैं कि देखिए लॉक डाउन कोरोना संक्रमण से बचाव का एक उपाय है। और ऐसा करके हम सफल हुए हैं क्योंकि आज हमने कोरोना को तीसरी स्टेज में नहीं पहुंचने दिया है। उनका मानना है कि इस तरह की महामारी अचानक आती है और इसकी योजना पहले से नहीं बनाई जा सकती। फिर भी सरकार ने इस आपदा की स्थिति में आवश्यक वस्तुओं के दाम वह महंगाई नहीं बढ़ने दी। हां शुरुआत में हम महामारी से निपटने की स्थिति में नहीं थे लेकिन अब राज्यों के परस्पर सहयोग से हम बेहतर कर रहे हैं। उनका मानना है कि इस आपदा ने हमें अवसर देने का काम भी किया है बस हमें समझने की जरूरत है। ऐसे में जहां एक और हमें अपनी स्वास्थ्य सेवाओं की सामर्थ्य जानने का मौका मिला है वहीं जरूरत इस बात की है कि अब हम जनसंख्या नियंत्रण बिल जैसे कड़े कदम उठाएं। साथ ही हमारे पास विश्व बाजार में चाइना का विकल्प बनकर आर्थिक रूप से शुद्ध होने का मौका भी है।
    कोरोना आपदा व लॉकडाउन की इन मिली जुली प्रतिक्रियाओं से एक बात तो सामने आई है कि लॉकडाउन इस महामारी से बचने का एक हालिया उपाय था। पर इससे बाहर आना भी खतरे से कम खाली नहीं है। लेकिन रोजी रोटी बचाने के लिए यह खतरा हमें उठाना ही होगा, जरूरत इस बात की है कि इस दिशा में हम हर कदम फूंक-फूंक कर उठाएं। विदेश तो छोड़ो हम अपने पंजाब राज्य से ही नसीहत ले सकते हैं जहां सबसे पहले लॉकडाउन किया गया था और "कांटेक्ट ट्रेसिंग व आइसोलेशन" के जरिए वहां हालात पर काबू पाया।